वन संरक्षण के नाम पर औपचारिकता निभा रहा लालबर्रा वन विभाग
पर्यावरण रैली से नदारद रहे रेंजर हर्षित सक्सेना व उनका वन अमला

बालाघाट। एक ओर देशभर में पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस पर विविध आयोजन किए जा रहे थे, वहीं दूसरी ओर जिनके कंधों पर पर्यावरण की रक्षा का सीधा उत्तरदायित्व है—लालबर्रा के रेंजर हर्षित सक्सेना और उनका पूरा स्टाफ—वे पर्यावरण रैली जैसे गंभीर सार्वजनिक कार्यक्रम से पूरी तरह नदारद रहे।
यह रैली औल्याकन्हार फिजिकल क्लब द्वारा आयोजित की गई थी, जो पिछले 36 दिनों से चल रहे ग्रीष्मकालीन एथलेटिक्स और वॉलीबॉल शिविर के समापन समारोह के हिस्से के रूप में पर्यावरण दिवस पर आयोजित की गई थी। शिविर में भाग लेने वाले सैकड़ों बच्चों ने अपने हाथों में “वृक्ष लगाओ, जीवन बचाओ” जैसे नारों वाली तख्तियां लेकर एक जागरूकता रैली निकाली, जो क्लब मैदान से शुरू होकर बड़ी पनबिहरी, छोटी पनबिहरी, थाना परिसर होते हुए वन विभाग के आमाटोला स्थित कार्यालय तक पहुंचने वाली थी।
फोन पर हुई बातचीत, फिर भी गैरहाजिर रहे रेंजर
रैली के संदर्भ में आयोजनकर्ताओं द्वारा रेंजर हर्षित सक्सेना से कई बार मोबाइल पर संपर्क कर उन्हें आमंत्रित किया गया। उनसे यह भी आग्रह किया गया कि यदि वे स्वयं उपस्थित नहीं हो सकते, तो कम-से-कम विभाग की ओर से कोई प्रतिनिधि या वनरक्षक भेजा जाए। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि ना तो रेंजर आए, ना ही उनका कोई प्रतिनिधि, और पूरा वन विभाग का अमला कार्यक्रम से पूरी तरह गायब रहा।
क्या वन विभाग को पर्यावरण की चिंता नहीं ?
यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि यह एक प्रशासनिक असंवेदनशीलता का भी संकेत देती है। जब स्थानीय स्तर पर आम जनता, विशेषकर बच्चे और युवा, पर्यावरण को लेकर सक्रिय रूप से प्रयास कर रहे हैं, तब संबंधित विभाग का इस प्रकार की भागीदारी से किनारा करना सरकारी तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। वन विभाग के कार्यालय तक रैली लाने का उद्देश्य यही था कि वन विभाग को बच्चों की पहल से प्रेरणा मिले, वे समाज के सामने उदाहरण प्रस्तुत करें। लेकिन कार्यक्रम की उपेक्षा कर विभाग ने स्वयं अपनी भूमिका को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है।
यह केवल अनुपस्थिति नहीं, एक संदेश है
इस कार्यक्रम में उपस्थित स्थानीय पुलिसकर्मियों, कराटे प्रशिक्षकों, और अन्य गणमान्य नागरिकों ने बच्चों का मनोबल बढ़ाया। सभी ने मिलकर पर्यावरण जागरूकता का संदेश दिया। लेकिन जब वन विभाग जैसे मुख्य जिम्मेदार अधिकारी ही गैरहाजिर रहे, तो यह अनुपस्थिति केवल “उपस्थित नहीं हो पाना” नहीं रह जाती—यह एक संदेश बन जाती है कि पर्यावरण केवल आम जनता का मुद्दा है, जिम्मेदार विभागों के लिए यह सिर्फ फाइलों में सिमटी औपचारिकता बनकर रह गया है।
जब जागरूकता कार्यक्रमों से ही किनारा, तो बाकी जिम्मेदारियों का क्या भरोसा ?
रेंजर हर्षित सक्सेना और उनके विभाग की यह उदासीनता यह सोचने को मजबूर करती है कि यदि ऐसे महत्वपूर्ण अवसरों पर भी उनकी सहभागिता नहीं है, तो जंगलों में अवैध कटाई, तस्करी, और पर्यावरणीय क्षरण जैसे गंभीर विषयों को लेकर उनकी संजीदगी कितनी होगी?
रेंजर पर ‘लकड़ी घोटाले’ के गंभीर आरोप
लालबर्रा वन परिक्षेत्र में रेंजर हर्षित सक्सेना की मौजूदगी में न्यायालय आदेश की धज्जियां उड़ाते हुए बिना परिवहन अनुज्ञा पत्र (टीपी) के बड़ी मात्रा में ईमारती लकड़ी मिलों तक पहुंचाई जा रही है। सूत्रों के अनुसार, 1 अप्रैल 2025 से न्यायालय द्वारा टीपी बिना लकड़ी परिवहन पर रोक है, बावजूद इसके ट्रांसपोर्टर वाहन धड़ल्ले से मिलों में लकड़ी चिरान के लिए भेज रहे हैं। रेंजर पर आरोप हैं कि वे मिल मालिकों व कुछ खास ट्रांसपोर्टरों से सांठगांठ कर नियमों की खुली अवहेलना कर रहे हैं, जबकि किसानों को वैध टीपी के लिए कार्यालय के चक्कर काटने पड़ते हैं। यह भी सामने आया है कि रेंजर द्वारा नियमों की मनमानी व्याख्या करते हुए आदेशों को नजरअंदाज किया जा रहा है, जिससे वन संसाधनों की खुली लूट को प्रशासनिक संरक्षण मिलने का संदेह पैदा हो रहा है।



