छत्तीसगढ़राज्य

बढ़ रही तामसी प्रवृत्ति को रोकने व सतोगुण को बढ़ाना है जरूरी : आचार्य झम्मन शास्त्री

जब तक बच्चों को संस्कार नहीं देंगे तब तक आकार भी नहीं बनेगा

 

रायपुर। सब लोगों के हित में सोचने वाला ही सच्चा राजनीतिज्ञ होता है। लेकिन आज की राजनीति दूषित हो चुकी है। राजनेता ऐशो आराम से रहते हैं और जनता तकलीफ में है। भागवत कथा इतिहास का बखान करने वाला सबसे उन्नत ग्रंथ है। वर्तमान समय में तमोगुण बढ़ रहा है। तामसी प्रवृत्तियों को रोकने तथा सतोगुण को बढ़ाना होगा। रात्रि में सोते तक हाथ में मोबाइल होता है यदि इसे छोड़कर प्रभु सुमिरन करते सोएं तो नींद अच्छी आयेगी और बुरे सपने भी परेशान नहीं करेंगे। रायपुरा अग्रोहा कालोनी विष्णुमंगलम में श्रीमद् भागवत कथा प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए कथाव्यास आचार्य झम्मन शास्त्री ने बताया कि देश की सुरक्षा के लिए जवानों पर करोड़ो रुपए खर्च किए जाते हैं। जबकि श्री रामचंद्र की सेना में शामिल सैनिकों ने भावनात्मक रूप से जुड़कर लंका जीत लिया। संस्कार और वचनों का क्रियान्वयन की सीख राजा दशरथ से लेनी चाहिए। जिन्होंने राजा जनक के भेजे हुए दहेज को गलत मानकर स्वीकार नहीं किया। रात्रि मे सोने से पहले मोबाइल छोड़कर भगवान को पकड़ लिया जाए। तो अच्छी नींद आएगी खराब सपना परेशान नहीं करेंगे। भगवान को तुलसी दल चढ़ाने को भी लोग कतराते हैं। यही कारण है कि उनके बच्चे दूध, मक्खन, रबड़ी, मलाई का स्वाद नहीं जानते। जब तक बच्चों को संस्कार नहीं देंगे तब तक आकार भी नहीं बनेगा। बच्चों को अच्छी संस्कार प्रदान करें नहीं तो तकलीफें बढ़ती रहेंगी। उन्होने कहा कि वर्तमान समय में तमोगुण बढ़ रहा है। तामसी प्रवृत्तियों को रोकने तथा सतोगुण को बढ़ाना होगा। सात्विक आहार के सेवन से काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईष्र्या, द्वेष, कलह रूपी दोष दुर्गुणों से विजय प्राप्त कर सकते हैं।

शास्त्री ने इस अवसर पर भगवान के विविध लीलाओं का चिंतन कराते हुए कहा कि सनातन धर्म में पंचदेव उपासना का विधान है। एक ही भगवान के कई रूपों में अवतार होता है। इससे भक्तों को उपासना करने में सुगमता होती है। तत्वता परमात्मा एक ही है। नाम, रूप, लीला, धाम के भेद से कई रूपों में दर्शन प्रदान कर भक्तों के ऊपर अनुग्रह करते हैं। भगवान के तीन रूप है। निर्गुण निराकार, सगुण निराकार और सगुण साकार सगुण साकार रूप से ध्यान पूजा आराधना करते-करते मन और चित्त् की चंचलता समाहित हो जाए तो निर्गुण ब्रह्म का ध्यान संभव हो सकता है। क्योंकि मन बहुत चंचल है। रसिक भी है। उसे वश में करने के लिए सुमधुर नाम रूप का आलंबन लेकर वश मे सकते है। इसलिए भक्तों में भगवान के हजारों नाम से सहस्रार्चन करने की परंपरा है। भगवान तो एक ही है कार्य भेद से पांच बनकर भी एक ही रहते हैं। सृष्टि पालन, संहार, विग्रह और अनुग्रह सनातनी धर्मावलम्बी हम हिंदुओं के यहां सौभाग्य प्राप्त है। पंच देव शिव, विष्णु, गणेश, दुर्गा, सूर्य आदि। भक्त तो जगत पालक परमात्मा को बालक बना लेते हैं और जगत जननी मां देवी को पुत्री बना लेते हैं। भगवान की विविध लीला है। यह हिंदुओं के देवी देवताओं की विशेषता है। अनेकता में एकता का आदर्श प्रस्तुत करते हुए। भगवान की लीलाओं से शिक्षा ग्रहण करना चाहिए। समाज में देश में परिवार मे एकता प्रेम की स्थापना के लिए कार्य में भेद साधक है बाधक नहीं, प्रकृति प्रदत्त भेद और शास्त्रागत भेद जो है। निर्भेद परमात्मा से मिलने का साधन है। यथार्थ को नहीं समझने के लिए अज्ञानता वश लोग कहते हैं। कि हिंदुओं के बहुत देवी देवता है। अन्य के ईश्वर की क्षमता ही नहीं कि वह एक से दो बन सके यही तो उनकी कमजोरी है। इसलिए अपना धर्म ईश्वर और संस्कृतियों अपने पूर्वजों पर हमें गर्व होना चाहिए। राम नाम, कृष्ण नाम, शिव नाम, नारायण नाम के अनन्त महिमा में गोविंद, गोपाल, मुरली माधव का नाम स्मरण करने में त्रयताप और भक्ति तथा मुक्ति की प्राप्ति सुगमता से संभव है।

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